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Gurukul Dev Rishi Meerut

प्रबन्धक

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॥ ओउम् ॥

शुभकामना संदेश

शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। शिक्षा के अभाव में कोई भी राष्ट्र उस शरीर के समान है जिसमें शारीरिक ढांचा (अस्थि, मांस-मज्जा) तो हो किंतु आत्मा न हो। शिक्षा किसी भी समाज या राष्ट्र की चेतना है जिसके अभाव में वह निर्जीव शरीर के समान होता है।

शिक्षा का स्वरूप सभ्यता, समाज और संस्कृति के अनुरूप परिवर्तित होता रहा है। शिक्षा दो प्रकार की होती है, औपचारिक और अनौपचारिक। मानव सभ्यता के उद्भव काल में शिक्षा का स्वरूप अनौपचारिक ही रहा फिर शनैः-शनैः उसने औपचारिकता को धारण किया।

भारतवर्ष में गुरुकुल शिक्षा पद्धति का एक गौरवशाली अतीत रहा है जिसमें औपचारिक एवं अनौपचारिक प्रविधियाँ सम्मिलित रही हैं। इस शिक्षा पद्धति के बल पर भारत ने अतीत में सम्पूर्ण विश्व का नेतृत्व किया। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला विश्वविद्यालय सदियों तक भारतीय ज्ञान और मेधा का केंद्र रहे, जहाँ सम्पूर्ण विश्व के ज्ञान पिपासु अपनी जिज्ञासाओं को लेकर भारत भूमि पर आते रहे।

भारत भूमि ज्ञान एवं अध्यात्म योग, चिकित्सा, ज्योतिष और दर्शन की भूमि रही है। भारतीय ज्ञान मीमांसा शास्त्रार्थ की हजारों वर्षों की परम्परा से निरन्तर है। वह केवल कही सुनी बातों या कूपमण्डूकता पर निर्भर नहीं रही। भारतीय शिक्षा पद्धति का व्यवहारिकता से गहरा रिश्ता है। हजारों वर्षों की ज्ञान परम्परा को हमने श्रुति परम्परा के रूप में जीवित रखा। भारतीय ज्ञान मीमांसा निरन्तरता में विश्वास रखती है। वह केवल रूढ़िवादी विचारों से चिपकी नहीं रहती अपितु बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं में परिवर्तन करती है।

अंग्रेजों के आगमन के पश्चात भारतीय शिक्षा पद्धति संक्रमण के दौर से गुजरी। अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत भारतीय शिक्षा पद्धति के प्राचीन स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर दिया। हम भारतीय भी अंग्रेजों के लगाए वृक्ष में फँसते चले गए और हमने पूर्णरूपेण अंग्रेजी शिक्षा को आत्मसात कर लिया। पाश्चात्य शिक्षा ने शिक्षा की आड़ में भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर भी छद्म रूप से प्रहार किया, जिसके परिणाम हम सभी देख रहे हैं। आज जहाँ साक्षरता दर लगातार बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर समाज में साक्षरता बढ़ने के बाद भी अपराध बढ़ते जा रहे हैं। समाज में कुंठाओं समस्याओं का जंगल उग आया है। यानी शैक्षिक मोर्चे पर हम निरंतर पिछड़ रहे हैं। ऐसे प्रतिकूल समय में ‘गुरुकुल देव ऋषि मेरठ विद्यालय’ अपनी मौलिक सोच और रचनात्मक विचारों से एक आशा के जुगनू की तरह नजर आता है।

यह संस्था एक पवित्र उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रही है। इसके हाथ में भारतीय संस्कृति की उज्ज्वल पताका है। इसकी नींव में अतीत का गौरवशाली अनुभव है। इसके निर्माण में पुरातन और आधुनिक का मणिकांचन योग है। यह भारत की समृद्ध विरासत (योग, ज्योतिष, चिकित्सा, अध्यात्म) और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को समाहित किए हुए है। यहाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना को चरितार्थ करने की प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है।

यह संस्था शैक्षिक जगत में एक नए बदलाव का वाहक बनेगी। उसके लिए गुरुकुल देव ऋषि परिवार दृढ़ संकल्पित है।

*प्रोo (डॉo) वीरेंद्र कुमार*

(प्रबन्धक)

Gurukul Dev Rishi Meerut